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वक़्त ने कहा.....काश थोड़ा और सब्र होता!!! सब्र ने कहा....काश थोड़ा और वक़्त होता!!!

आगे सफर था और पीछे हमसफर था.. रूकते तो सफर छूट जाता और चलते तो हमसफर छूट जाता.. मंजिल की भी हसरत थी और उनसे भी मोहब्बत थी.. ए दिल तू ही बता,उस वक्त मैं कहाँ जाता... मुद्दत का सफर भी था और बरसो का हमसफर भी था रूकते तो बिछड जाते और चलते तो बिखर जाते.... यूँ समँझ लो, प्यास लगी थी गजब की... मगर पानी मे जहर था... पीते तो मर जाते और ना पीते तो भी मर जाते. बस यही दो मसले, जिंदगीभर ना हल हुए!!! ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए!!! वक़्त ने कहा.....काश थोड़ा और सब्र होता!!! सब्र ने कहा....काश थोड़ा और वक़्त होता!!! सुबह सुबह उठना पड़ता है कमाने के लिए साहेब...।। आराम कमाने निकलता हूँ आराम छोड़कर।। "हुनर" सड़कों पर तमाशा करता है और "किस्मत" महलों में राज करती है!! _________________________ "शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी, पर चुप इसलिये हु कि, जो दिया तूने, वो भी बहुतो को नसीब नहीं होता".. अजीब सौदागर है ये वक़्त भी!!!! जवानी का लालच दे के बचपन ले गया.... अब अमीरी का लालच दे के जवानी ले जाएगा. ....... _________________________ आप कितने भी पवित्र शब्द        ...

बोर्ड मां लखी शकाय तेवा 4 सुविचार.

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मघसॅ डे ने उजववा करतां ते मघर साथे अडघो कलाक पसार करशो तो पण तेना जीवनमां उत्सव जेवुं वातावरण रहेशे.

मातृशकितने सलाम : आजे '' मघॅस डे '' छे. कवि कहे छे: ' हे मानवी शीतळता मेळववाने माटे दोडादोड शानी करे छे ? साची शीतळता तो मानी गोदमां ज छे, जे हिमालयनी टोच पर पण नथी. ' गुजराती कवि बोटादक...

जो रुला के खुद भी रो पड़े वही "माँ" है।

रुलाना हर किसी को आता है, हँसाना भी हर किसी को आता है, रुला के जो मना ले वो "पापा"  है, और जो रुला के खुद भी रो पड़े वही "माँ" है। ________________________ आज लाखो रुपये बेकार है वो एक रुपये के सामने जो MAA स्कूल जाते वक्त देती थी ________________________ -माँ- माँ एक ऐसा शब्द हैं, जिसे सिर्फ़ बोलने से ही अपने हृदय में प्यार और ख़ुशी की लहर आ जाती हैं... ________________________ "माँ" तू है, तो हम है... "माँ" एक रिश्ता नहीं एक अहसास है, भगवान मान लो या खुदा, खुद वो माँ के रूप में हमारे आस पास है.. मारी वन्दनीय माँ अने मारा तमाम मित्रो ना माँ ने मारा प्रणाम..  ________________________ माँ है तो लोरी है शगुन है माँ है तो गीत है उत्सव है माँ है तो मंदिर है मोक्ष है माँ है तो मुमकिन है शहंशाह होना, माँ के आँचल से बड़ा दुनिया में कोई साम्राज्य नहीं ________________________ I A S के साक्षात्कार में एक सवाल पूछा गया यदि गर्दन नीची कर आपको खाने को कहा जाय हर रोज अलग-अलग महिलाऐ बिना बोले आपको खाना परोसे..और ये पता लगाना हो कि आपकी मां ने किस दिन खाना परोसा...

लाइन छोटी है पर मलतब बहुत बड़ा है.

लाइन छोटी है पर मलतब बहुत बड़ा है.. उम्र भर उठाया बोझ उस ''खीली'' ने.. और लोग तारीफ़ ''तस्वीर'' की करते रहे.. ______________________________ ❛"मतलब की बात          सब समजते है,      "सही बात का मतलब         कोइ नहि समजता" ______________________________ कीसीकी तलाश मे मत नीकलो.. लोग खो नही - बदल जाते हे छोटे थे तब सब नाम से बुलाते थे , बड़े हो गये तो बस काम से बुलाते हे..!! ______________________________ सब फ़साने हैं दुनियादारी के, किस से किस का सुकून लूटा है; सच तो ये है कि इस ज़माने में, मैं भी झूठा हूँ तू भी झूठा है। ______________________________ (1) “मतलब” का वजन बहुत ज्यादा होता है, तभी तो “मतलब” निकलते ही रिश्ते हल्के हो जाते है.                                     (2) जब कोई दिल दुखाये तो बेहतर है चुप रहना चाहिये... ....

माँ बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है

माँ संवेदना है, भावना है, अहसास है माँ जीवन के फूलों में, खूशबू का वास है माँ रोते हुए बच्चे का, खुशनुमा पालना है माँ मरूस्थल में नदी या मीठा-सा झरना है माँ लोरी है, गीत है, प्यारी-...

माँ तो माँ होती है! क्या मेरी, क्या तेरी?

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माँ तो माँ होती है! क्या मेरी, क्या तेरी? पति के घर में प्रवेश करते ही पत्नी का गुस्सा फूट पड़ा : "पूरे दिन कहाँ रहे? आफिस में पता किया, वहाँ भी नहीं पहुँचे! मामला क्या है?" "वो-वो... मैं..." पति की हकलाहट पर झल्लाते हुए पत्नी फिर बरसी, "बोलते नही? कहां चले गये थे। ये गंन्दा बक्सा और कपड़ों की पोटली किसकी उठा लाये?" "वो मैं माँ को लाने गाँव चला गया था।" पति थोड़ी हिम्मत करके बोला। "क्या कहा? तुम्हारी मां को यहां ले आये? शर्म नहीं आई तुम्हें? तुम्हारे भाईयों के पास इन्हे क्या तकलीफ है?" आग बबूला थी पत्नी! उसने पास खड़ी फटी सफेद साड़ी से आँखें पोंछती बीमार वृद्धा की तरफ देखा तक नहीं। "इन्हें मेरे भाईयों के पास नहीं छोड़ा जा सकता। तुम समझ क्यों नहीं रहीं।" पति ने दबीजुबान से कहा। "क्यों, यहाँ कोई कुबेर का खजाना रखा है? तुम्हारी सात हजार रूपल्ली की पगार में बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च कैसे चला रही हूँ, मैं ही जानती हूँ!" पत्नी का स्वर उतना ही तीव्र था। "अब ये हमारे पास ही रहेगी।" पति ने कठोरता अपनाई। "मैं क...